सांप्रदायिकता पर निबंध

Sampradayikta Essay in Hindi यदि एक हिंदू गर्व से कहता है कि वह हिंदू है, तो क्या यह सांप्रदायिकता है| यदि एक मुसलमान कहता है कि उसे मुसलमान होने का गर्व है और एक अच्छा मुसलमान बने रहने के लिए वह अपनी जान भी दे सकता है, तो क्या यह सांप्रदायिकता मानी जाएगी| जब एक अल्पसंख्यक समुदाय को लगता है कि उसका कई दशकों से अन्यायपूर्ण दमन के साथ शोषण हो रहा है और प्रतिक्रियास्वरुप वह तीव्र विरोध करता है, तो क्या यह  सांप्रदायिकता की जा सकती है| यदि ईसाई, पारसी आदि और अपना व्यक्तिगत और निजी जीवन अपने विश्वासों और धार्मिक मतों के अनुसार व्यतीत करते हैं, तो क्या वह सांप्रदायिक हैं| ऐसे अनेक प्रशन है, जो हमें सांप्रदायिकता की की सुस्पष्ट परिभाषा ढूंढ़ने के लिए विवश करते हैं|

Sampradayikta Essay in Hindi 200 Words

वास्तव में सांप्रदायिकता एक विचारधारा है, जो बताती है कि समाज धार्मिक समुदाय में विभाजित है, जिनके हित एक दूसरे से भिन्न है और कभी-कभी उनमें पारस्परिक उग्र विरोध भी होता है| सांप्रदायिकता का अंग्रेजी पर्याय (Communalism) है| Communalism अपने मूल शब्द Commune से उत्पन्न हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ मिल-जुलकर भाई चारे के साथ रहना है, लेकिन इतिहास की कुछ उन विशिष्ट अवधारणाओं में सांप्रदायिकता भी शामिल है जो अपना वास्तव अर्थ अपने मूल अर्थ से भिन्न रखती है|

सांप्रदायिकता की विचारधारा मूलत: धार्मिकता से जुड़ी होती है| धर्म के साथ मेल करके ही सांप्रदायिकता की विचारधारा पल्लवित होती है| साम्प्रदायिक व्यक्ति वे होते हैं, जो राजनीति को धर्म के माध्यम से चलाते हैं| साम्प्रदायिक व्यक्ति धार्मिक नहीं होता, बल्कि वह एक ऐसा व्यक्ति होता है जो राजनीति को धर्म से जोड़कर राजनीति रूपी शतरंज की चाल खेलता है| उसके लिए धर्म एवं ईश्वर केवल उपकरण मात्र हैं जिनका उपयोग में समाज में विलासितापूर्ण जीवन जीने एवं व्यक्तिगत लक्ष्य की प्राप्ति के लिए करता है| धर्म के नाम पर सांप्रदायिकता की आग फैलाने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हुए हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला में लिखा है वह बढ़ाते मंदिर मस्जिद मेल कराती मधुशाला|

Sampradayikta Essay in Hindi Language
सांप्रदायिकता पर निबंध – Sampradayikta Essay in Hindi Language

Sampradayikta Essay in Hindi 300 Words

भारत पर विदेशी मुसलमानों के आक्रमण लगभग 10 सताब्दी में प्रारंभ हो गए थे, परंतु महमूद गजनबी और मोहम्मद गौरी जैसे मुस्लिम आक्रमणकारी धार्मिक आधिपत्य स्थापित करने की अपेक्षा आर्थिक संसाधनों को लूटने में अधिक रुचि रखते थे| कुतुबुद्दीन ऐबक के आगमन के इसके दिल्ली का पहला शासक बनने के बाद इस्लाम धर्म ने भारत में अपने पैर जमाए| इसके पश्चात मुगलों अपने समाज साम्राज्य को संगठित करने की प्रक्रिया में इस्लाम को मुख्य हथियार बनाते हुए धर्म परिवर्तन के प्रयत्न किए तथा हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच सांप्रदायिक झगड़ो को भड़काने का प्रयास किया|

जब अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से भारत पर अपना आधिपत्य जमाया, तो प्रारंभ में उन्होंने हिंदुओं को संरक्षण देने की नीति अपनाई, परंतु 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात अंग्रेजों ने भारतीय जन एकता को खंडित करने के लिए खुलकर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई फलस्वरूप झगड़ों को अत्यधिक प्रोत्साहन मिला| यह कहा जा सकता है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पारस्परिक विरोध बहुत पुराना मुद्दा है लेकिन हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश शासन की विरासत है| अंग्रेजो ने भारत को स्वतंत्र किया मगर हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बांटकर दोनों देशों को सांप्रदायिकता की आग में झुलसने के लिए छोड़ दिया जिसका लेखिका अमृता प्रीतम ने अपने उपन्यास पिंजङ मे बड़ा ही सजीव वर्णन किया है| दोनों देशों के सांप्रदायिक हिंदुओं और मुसलमानों की व्यंग्यात्मक शैली में निंदा करते हुए भारत के वर्तमान शायर निदा फाजली लिखा है हिंदू भी मजे में है मुसलमान मैं भी मजे में है इंसान परेशान यहां भी है वहां भी|

इतिहासकार प्रो विपिन चंद्र का मानना है कि कांग्रेस ने प्रारंभ से ही “चोटी से एकता” की नीति अपनाई, जिसके अंतर्गत मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग मुसलमानों (जिन्हें मुसलमान समुदाय का नेता माना जाता था) को अपनी और करने का प्रयत्न किया गया| हिंदू और मुसलमान दोनों के द्वारा जनता के साम्राज्य विरोधी भावनाओं की सीधी अपील करने के लिए स्थान पर यह मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग के मुसलमानों पर छोड़ दिया गया कि वे मुसलमान जनता को आंदोलन में सम्मिलित करें| इस प्रकार “चोटी से एकता” उपागम साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए हिंदू मुस्लिम एकता को प्रोत्साहित नहीं कर पाया|

Sampradayikta Essay in Hindi 400 Words

संभवत प्रारंभ में राष्ट्रीय नेतृत्व में यह अप्रत्यक्ष सहमति थी कि हिंदू, मुसलमान और सिख पृथक समुदाय हैं, जिनमें केवल राजनीतिक एवं आर्थिक मामलों में एकता है परंतु धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रथाओं में नहीं| इस प्रकार के सांप्रदायिकता के बीच 20 वी शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में बोये गए| पाकिस्तान का नारा मुस्लिम लीग ने लाहौर में सर्व प्रथम वर्ष 1940 में दिया मुस्लिम जनता के विभिन्न समूह में पाकिस्तान के बारे में विभिन्न माध्यम मुसलमान कृषको  के लिए पाकिस्तान का “हिंदू जमींदार के शोषण से मुक्ति” मुसलमान व्यापारी वर्ग के लिए इसका अर्थ “सुव्यवस्थित हिंदू व्यापारिक तंत्र से छुटकारा” जबकि मुसलमान बुद्धिजीवी वर्ग के लिए इसका अर्थ था “बेहतर रोजगार के अवसर”|

भारत के संदर्भ में कहा जा सकता है कि हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता की राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्त्रोत्र थे और उनमें संघर्ष का उत्तरदायी केवल धर्म ही नहीं था| आर्थिक स्वार्थ और सांस्कृतिक एवं सामाजिक रीति रिवाज भी प्रमुख कारक थे, जिन्होंने दोनों समुदायों के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया और यह दूरी धीरे धीरे उग्र होकर घृणा, द्वेष एवं प्रतिशोध पर आधारित सांप्रदायिक हिंसा में तब्दील हो गई| सांप्रदायिकता धर्म की अपेक्षा राजनीति से अधिक प्रेरित होती है| सांप्रदायिक तनाव का कर्ताधर्ता राजनीतिज्ञों का एक वर्ग होता है जो, पाखंडी धार्मिक व्यक्तियों की एक वर्ग को साथ लेकर अपनी राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़  करने स्वंय को समृद्ध बनाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाना चाहता है और जन-सामान्य के आगे में स्वयं को अपने समुदाय के सबसे बड़े हिमायती के रुप में प्रस्तुत करता है| वास्तव में साम्प्रदायिक हिंसा धार्मिक कट्टरवाद द्वारा भड़काई जाती है, इसकी पहल असामाजिक तत्वों द्वारा की जाती है| राजनीति में सक्रिय व्यक्ति इसे समर्थन देते हैं, निहित स्वार्थी तत्व से वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं और पुलिस में प्रशासकों की निर्दयता के कारण यह तेजी से फैलती है|

भारत में सांप्रदायिकता का एक महत्वपूर्ण कारक पड़ोसी देश पाकिस्तान के शासकों की भारत के प्रति द्वेष की भावना भी है| अस्थिरता उत्पन्न करने वाले पाकिस्तान के कई प्रयत्नों ने हिंदुओं और मुसलमानों में एक दूसरे के प्रति दुर्भावना और संदेह पैदा किया है| पाकिस्तान द्वारा जब-जब भारतीय सीमा पर की जाने वाली गोलाबारी और वहां के आतंकवादियों द्वारा आजादी पर किए गए हमलो से यह बात प्रमाणित भी हो चुकी है| यही बात भारत के कुछ हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथियों एवं संगठनों के लिए भी कही जा सकती है, धर्म के नाम पर अपने ही देश में द्वेषपूर्ण भावनाएं भड़का रहे हैं| चाहे कश्मीर में हिंसा का मामला हो या राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद का विवाद हो या फिर वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर और उसके बराबर स्थित मजिस्द का विवाद, इस तरह के सभी प्रकरणों ने दोनों समुदाय के रिश्ते में खटास पैदा किया| प्रेस व संचार माध्यम भी अपने अपने तरीकों से सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाने में योगदान देते हैं| उनके द्वारा अफवाहों पर आधारित तथ्यों की गलत प्रस्तुति आग में घी जैसा काम करती है|

Sampradayikta Essay in Hindi
सांप्रदायिकता पर निबंध – Sampradayikta Essay in Hindi

Sampradayikta Essay in Hindi 500 Words

सांप्रदायिक हिंसा कि यदि सामाजिक व्याख्या की जाए, तो यह कहा जा सकता है कि लोग हिंसा का उपयोग इसलिए करते हैं क्योंकि वह असुरक्षा एवं चिंता से ग्रस्त होते हैं| इन भावनाओं एवं चिंताओं की उत्पत्ति उन सामाजिक अवरोध से होती है, जो दमनात्मक सामाजिक व्यवस्था और सत्ताधारी अभिजनों द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं| व्यक्ति की पृष्ठभूमि एवं पालन-पोषण के कारण से उसमें ऐसी भावनाओं का जन्म होता है| सांप्रदायिक दंगों से निपटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं, जैसे सांप्रदायिक मानसिकता रखने वाले राजनीतिज्ञों को चुनाव लड़ने से वंचित करना है, धर्मांध लोगों के विरुद्ध निरोधात्मक कार्रवाई करना, पुलिस विभाग को राजनीतिज्ञों के नियंत्रण से मुक्त करना, पुलिस की खुफिया विभाग को और शक्तिशाली बनाना, पुलिस बल की पुनःसरचना करना, पुलिस प्रशासन को आर्थिक संवेदनशील बनाना, पुलिस अधिकारियों के प्रशिक्षण के अंतर्गत उन्हें धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाने के योग्य बनाना| सरकार को ऐसे निवारक उपाय भी करने होंगे, जिनके द्वारा भेदभाव एवं सापेक्षिक वचन की भावना को कम किया जा सके| आज समान नागरिक सहिंता की अत्यधिक आवश्यकता है|

भारत की जनता अब इतनी परिपक्व हो चुकी है कि वह शराफत का मुखौटा लगाए इन स्वार्थी, कपटी एवं धूर्त लोगों की आसानी से पहचान कर उनका मुंहतोड़ जवाब दे सके| स्वयं को इतना सुदृण एवं विवेकशील बनाना होगा कि उचित-अनुचित, नैतिक-अनैतिक, तार्किक-अतार्किक आदि के बीच अंतर की स्पष्ट पहचान की जा सके, जिससे राष्ट्रीय एकता एवं मानवीयता की गरिमा बरकरार है| आज हम सबको स्वामी विवेकानंद की कही बात को आचरण मे लाने  की आवश्यकता है, हम भारतीय सभी धर्मों के प्रति केवल सहिषुणता में ही विश्वास नहीं करते वरन् सभी धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार भी करते हैं|

भारत एक ऐसा देश रहा, जहां मुसलमान बाहरी आक्रमणकारी के रूप में तो अवश्य आएं, लेकिन एक बार आने के बाद में बाहरी नहीं रह गए| उन्होंने इस देश कोई अपना देश माना और यहां की संस्कृति को बहुत गहराई तक आत्मसात् किया| भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति के अंतर्गत ही अकबर ने दीन ए इलाही धर्म चलाया और अवध के नवाब वाजिदअली शाह तो 1 दिन ही दिन गम का त्यौहार मोहर्रम और खुशी का त्यौहार होली पड़ने पर, दोनों ही मनाते थे| कारण स्पष्ट था क्योंकि मजहब अपनी जगह है और इंसानियत अपनी जगह है| कोई भी मजहब किसी को वैमनस्य नहीं सिखाता| अमीर खुसरो ने अपनी मजनबी नूर सिपह में लिखा है लोग पूछते हैं कि भारत के प्रति मेरे मन में श्रद्धा क्यों है? भारत मेरी जन्म भूमि और मेरा देश है| पैगम्बर ने कहां है कि अपने देश से प्रेम करना मजहब का एक हिस्सा है| धर्म के आधार पर लोगों को विभाजित करने का कार्य सिर्फ़ निजी स्वार्थ की पूर्ति करने वाले असामाजिक एवं निकृष्ट कोटी के लोग ही करते हैं|

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